21 January, 2016

साँस तो ले लो

मन करता है कहीं छुप जाऊँ - 
अम्मा के पल्लू के नीचे 
उनके पेट की ठंडक पे 
सेहलालूँ थोड़ी देर 
अपने मन के सलवटों को। 

और धीरे से वो
मेरे माथे को सहलातीं - 
"बस, बस, रुक जाओ,
कहाँ भागी जा रही हो?
साँस तो ले लो। 

मैं सांस लेती हूँ - लम्बी -  
और कुछ देर ही सही,
मेरे चिन्ताओं के गाँठ
उधड़ते दीखते हैं
उनके हाथों में 
मानो ऊन के गोले।  

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